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शर्तों के साथ कांग्रेस लगाएगी तेजस्वी की सीएम उम्मीदवारी पर मोहर

बिहार चुनाव विशेष
रितेश सिन्हा

बिहार चुनाव को लेकर कांग्रेस आलाकमान गठबंधन में अपनी सीटों की संख्या को लेकर असमंजस में है। रही सही कसर प्रभारी और अध्यक्ष अपने चहेतों की सीटों को लेकर मनमानी पर तुले हैं। कांग्रेस ने कानू-गोलू व अन्य सर्वे रिपोर्ट के बाद वैसे ही कम 70 की बजाए 58 सीटों पर ही चुनाव लड़ने का मन बनाया है। बकायदा ऑब्जर्बर भेज कर एक-एक सीट के लिए तीन-तीन नाम भी मंगवाए थे। कानू-गोलू और अन्य सर्वे के रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस ने अपने 58 सीटों पर उम्मीदवार पहले ही तय किए हैं। नाम न छापने की शर्त पर कई उम्मीदवारों ने स्वीकार किया कि प्रदेश प्रभारी अल्लावरू और उनके साथ राष्ट्रीय सचिवों की टीम ने नाम देने के नाम पर अच्छा-खासा कारोबार कर लिया।
कांग्रेस के रणनीतिकार बिहार में एक रणनीतिक चूक कर बैठे, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा। पार्टी ने पूरे प्रदेश में राहुल गांधी को घुमाकर राजद को ही मजबूत करने का काम किया। नामांकन की तारीख नजदीक आते ही राजद ने इसका फायदा उठाते हुए कांग्रेस को समेटने का अपना पुराना एजेंडा लागू कर दिया। राजद अपनी शर्त के मुताबिक तेजस्वी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने का दवाब बनाते हुए पहले 42 अब 48 सीटें देने की बात कर रहा है। राजद के प्रवक्ता वकील बने कांग्रेसी सांसद अखिलेश सिंह उसकी इस रणनीति को कामयाब करने में जुटे हैं।
अखिलेश का बार-बार तेजस्वी को मुख्यमंत्री घोषित करने का बयान मीडिया और अखबारों में सुर्खियां बटोरता रहा है। अखिलेश और उनका परिवार पिछले 8 चुनावों में बुरी तरह पराजित होता रहा है। तेजस्वी के हनुमान बने लोकसभा हार के बाद फिर से अखिलेश अब अपने पुत्र आकाश कुमार को विधानसभा चुनाव लड़ाने पर आमदा हैं। अखिलेश कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बूते दिल्ली और बिहार की सियासत में अब तक मचान के शेर साबित हुए हैं। राजद के सहारे ही दो बार सांसद और प्रदेश अध्यक्ष बनने के साथ-साथ बिहार प्रदेश से हटाए जाने के बाद सीडब्लूसी में खरगे की कृपा से अपनी जगह पक्की कर ली। अखिलेश के बूते ही राजद कांग्रेस आलामकान को अपनी जेब में रखता आया है।


असमंजस में पड़े कांग्रेस आलाकमान ने दिल्ली से बिहार चुनाव के लिए दो पूर्व मुख्यमंत्री और एक लोकसभा में नेता सदन रहे क्रमशः गहलोत, बघेल और अधीर रंजन सहित 41 दिग्गजों को मैदान में उतारा है। इनमें कई कांग्रेसी प्रदेशों के अध्यक्ष व प्रभारी भी हैं। ये एक जिले और 1 विधानसभा सीट के लिए अपनी ताकत झोकेंगे। दिल्ली से पहुंची इस टीम ने लालू परिवार से मुलाकात कर पिछले वायदों के साथ 70 को छोड़ते हुए दवाब बनाते हुए सिर्फ 58 सीटों पर अपना दावा पेश किया। ओबीसी वोटरों को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिशों की तौर पर खास तौर पर गहलोत और बघेल को बिहार भेजा है। कांग्रेस का ओबीसी कार्ड बने घूम रहे अनिल जयहिंद गयाजी के टिकट कांड के बाद गहलोत, बघेल, अधीर की तिकड़ी के साथ बिहार में उतरे 41 दिग्गजों में उनका अता और पता भी नहीं है। कांग्रेस में घुसते ही राहुल के समानांतर बिहार में रैली कर रहे अनिल जयहिंद अब किनारे लग चुके हैं।

कांग्रेस की पहली संभावित सूची में जो नाम प्रमुखता से लिए जा रहे हैं, उनमें 33000 से अधिक वोटों से हार चुके रीगा से पूर्व विधायक अमित कुमार टुन्ना और पूर्व आईपीएस अधिकारी रह चुके बीके रवि को रोसरा से प्रभारी की पूरी ताकत के साथ पहली लिस्ट में इनको घोषित करवाना प्राथमिकता है। कांग्रेस ने अब तक वर्तमान विधायकों को टिकट देने का ऐलान नहीं किया है, लेकिन कुछ नामों की घोषणा को लेकर प्रभारी हड़बडी में है। इनमें एक नाम मुजफ्फरपुर से विधायक विजेंद्र चौधरी का भी है।
जिन सीटों पर अभी कांग्रेस और राजद में विवाद है, उनमें बायसी, बनमनखी, बहादुरगंज, कहलगांव, सहरसा और रानीगंज शामिल है। कहलगांव को छोड़कर बाकी सभी सीटें सीमांचल क्षेत्र से आती हैं। इन सीटों पर अन्य दलों से उकताए अल्पसंख्यक वोटर्स जीत में बड़ी भूमिका निभाते हुए कांग्रेस का हाथ मजबूत कर सकते हैं। कांग्रेस ने तेजस्वी के डर से कन्हैया को पीछे कर दिया है, अब पप्पू यादव से भी पीछा छुड़ाने के फेर में है। कितनी सीटों पर कांग्रेस जीत सकेगी, यह टिकट वितरण के बाद ही तय हो जाएगा। कांग्रेस पर दवाब बनाने के लिए राजद ने सियासी दांव खेलते हुए वीआईपी के मुकेश साहनी को उपमुख्यमंत्री पद का झांसा देते हुए कांग्रेसियों पर राजनीतिक प्रहार करने के लिए छोड़ रखा है। देखना है कि पिछली गलतियों से कांग्रेस कितना सीख पाती है, इस पर सभी की नजरें लगी रहेगी। (लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के हैं इससे संपादकीय मंडल का सहमत होना ज़रुरी नहीं )

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