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मदरसा तुल उलूम से एएमयू तक- 106 साल की विरासत पर अतिक्रमण का सवाल

सैय्यद अतीक उर रहीम
शिक्षक एवं पत्रकार

अलीगढ़ ।  अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को बने 106 साल हो गए हैं। 1875 में सर सैयद अहमद खान के हाथों “मदरसा तुल उलूम” के रूप में शुरू हुई यह तहजीब, 1877 में ही “मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज” बनी, और 1 दिसंबर 1920 को “अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट” के तहत इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिल गया। यानी भारत आजाद होने से 27 साल पहले।

यह सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं है। यह लाखों घरों की दुआ है, लाखों छात्रों का मुक़द्दर है। दुनिया भर में फैले (10यूँ ) लाख से ज्यादा AMU के पूर्व छात्र आज भी इसी नाम से पहचाने जाते हैं।

लेकिन आज उसी विरासत की जमीन पर सवाल उठ खड़ा हुआ है। नगर निगम द्वारा “विश्वविद्यालय की जमीन को अपनी बताकर कब्जे की कोशिश” की खबर ने छात्रों, शिक्षकों, पूर्व छात्रों वाइस चांसलर प्रोफेसर नईमा खातून के साथ साथ पूरे यूनिवर्सिटी प्रशासन को बेचैन कर दिया है।

सवाल सिर्फ जमीन का नहीं है। सवाल 106 साल की तारीख, कानून, और एक कौम के तालीमी मरकज के वजूद का है।

कानून क्या कहता है: क्या नगर निगम पुरानी जमीन पर दावा कर सकती है?

इस मामले को समझने के लिए हमें 3 कानूनी आधार देखने होंगे:

A. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट, 1920 – सेक्शन 3 और 4
AMU एक “Body Corporate” है। AMU एक्ट 1920 की धारा 3 के अनुसार यूनिवर्सिटी एक “निगमित संस्था” है जिसे “स्थायी उत्तराधिकार और एक सामान्य मुहर” प्राप्त है। धारा 4 में स्पष्ट लिखा है कि यूनिवर्सिटी “अचल और चल संपत्ति अर्जित करने, रखने और निपटान करने” के लिए अधिकृत है।

मतलब: 1920 से ही यूनिवर्सिटी को कानूनन जमीन रखने का अधिकार संसद ने दिया है। जो जमीन 1877 से 1920 के बीच कॉलेज के नाम पर थी, वो 1920 में ऑटोमैटिकली यूनिवर्सिटी की हो गई।

B. “Doctrine of Continuity” और “Adverse Possession” का सिद्धांत
कानून में एक सिद्धांत है – अगर कोई संस्था 12 साल से ज्यादा समय तक किसी जमीन पर शांतिपूर्ण, खुला और निर्विरोध कब्जा रखे, तो उसका अधिकार और मजबूत हो जाता है। AMU के पास 1877 से यानी 148 साल से कब्जा है।
“Limitation Act, 1963” की धारा 65 के तहत भी सरकारी/सार्वजनिक संस्था की जमीन पर अतिक्रमण की सीमा 30 साल है। नगर निगम को यह साबित करना होगा कि उसने पिछले 30 सालों में उस जमीन पर कब्जा किया था – जो संभव नहीं है।

C. उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959
नगर निगम को शहर की जमीन पर अधिकार तभी होता है जब वो जमीन “Nazul” या “सरकारी” घोषित हो और किसी को आवंटित न की गई हो। लेकिन AMU की जमीन “Nazul” नहीं है। वो 1920 के एक्ट और उससे पहले के “Gift Deeds” और “Sale Deeds” के जरिए कॉलेज/यूनिवर्सिटी के नाम है।

सुप्रीम कोर्ट का रुख: State of Rajasthan vs. Hari Chand में कोर्ट ने कहा था कि “सरकारी संस्था की सदियों पुरानी जमीन पर स्थानीय निकाय का दावा तब तक नहीं चल सकता जब तक वो यह साबित न करे कि जमीन का आवंटन रद्द हुआ था।”[1998]

मैं ये कह सकता हूं कि कानूनन नगर निगम का दावा कमजोर है। जो जमीन 1920 के संसदीय अधिनियम से पहले से एक शैक्षणिक संस्था के पास है, उस पर निगम एकतरफा दावा नहीं कर सकती। इसके लिए उसे सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर साबित करना होगा।

हमें ये समझना होगा कि ये जमीन नहीं, जज्बा है*
AMU की हर इंच जमीन पर सर सैयद का पसीना है। वो जमीन जहां मदरसा तुल उलूम की पहली क्लास लगी, वो जमीन जिस पर स्ट्रेची हॉल खड़ा है, वो खेल का मैदान जहां हजारों बच्चों ने हॉकी खेली वो ज़मीन जहां हमारे छात्रों ने घोड़े दौड़ाए ये सब “वक्फ” नहीं, “तालीम की विरासत” है।

आज दुनिया भर में बैठा AMU का छात्र जब ये खबर सुनता है तो उसे लगता है कि जैसे उसके घर पर कोई दावा कर रहा हो। एक पूर्व छात्र लंदन से लिखता है, “हमारी पहचान AMU है। अगर उसकी जमीन चली गई तो हम कहां जाएंगे?”

छात्र बेचैन हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर आज एक टुकड़ा गया तो कल पूरा कैंपस खतरे में पड़ जाएगा।

मैं ये बड़ी जिम्मेदारी के साथ लिख रहा हूं कि यूनिवर्सिटी की भी कुछ जिम्मेदारी है , उन प्रोफेसर्स को जिन को वाइस चांसलर प्रशासनिक जिम्मेदारी देती हैं उनको “हिफाजत खुद करनी होगी”*
इतिहास गवाह है कि बड़ी संस्थाएं तभी कमजोर होती हैं जब वो अपने कागजों और सीमाओं को लेकर लापरवाह हो जाएं। इसलिए इस मौके पर AMU प्रशासन को भी आत्ममंथन करना होगा:

A. दस्तावेजों का डिजिटलीकरण और Legal Cell को मजबूत करना
1. Land Records Digitize करें: 1877 से लेकर अब तक के सभी “Sale Deed, Gift Deed, Mutation, Nazul Lease” को स्कैन करके National Archives और कोर्ट में सुरक्षित रखें। ब्लॉकचेन आधारित Land Titling सबसे सुरक्षित विकल्प है।
2. Dedicated Legal Team: एक स्थायी कानूनी सेल बनाएं जो सिर्फ जमीनों के मामलों को देखे। हर जिले में जहां AMU की प्रॉपर्टी है वहां एक “Nodal Officer” नियुक्त हो।

B. भौतिक सीमा को सुरक्षित करना – Boundary Wall
“Possession is 9/10th of Law”। जहां-जहां यूनिवर्सिटी की जमीन है और बाउंड्री नहीं है, वहां तुरंत बाउंड्री कराई जाए। CCTV, गेट और चौकीदारी हो।
कई माफिया और स्थानीय निकाय इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं कि “जमीन खाली पड़ी है”।

C. पूरे देश की प्रॉपर्टी का ऑडिट
AMU की दिल्ली, मुरादाबाद, मालदा, किशनगंज में भी जमीनें और सेंटर हैं। एक बार “Central Property Audit” हो। हर प्रॉपर्टी का नक्शा, खसरा, खतोनी ऑनलाइन पोर्टल पर डालें ताकि पारदर्शिता रहे।

5. नगर निगम से अपील: कानून से चलें, टकराव से नहीं
नगर निगम शहर के विकास के लिए बनी है। उसका काम सड़क, पानी, सफाई है। एक 106 साल पुरानी शैक्षणिक संस्था से टकराव शहर के लिए भी अच्छा नहीं।

अगर नगर निगम को लगता है कि कोई जमीन “सार्वजनिक उपयोग” की है, तो उसका तरीका “बुलडोजर” नहीं, “बातचीत और कोर्ट” है।
धारा 144 और जबरन कब्जे से पहले नोटिस देना, सुनवाई करना – ये “Principles of Natural Justice” हैं।

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हम उम्मीद करते हैं कि नगर निगम कानून का सम्मान करेगी और इस मुद्दे को टेबल पर बैठकर हल करेगी, न कि मीडिया और तनाव के जरिए।

6. रास्ता क्या है? 5 सूत्रीय मांग
1. तुरंत यथास्थिति: जब तक मामला कोर्ट में तय न हो, दोनों पक्ष यथास्थिति बनाए रखें।
2. Joint Survey: यूनिवर्सिटी + नगर निगम + राजस्व विभाग की संयुक्त टीम जमीन का सर्वे करे।
3. संसद को जानकारी: AMU एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। शिक्षा मंत्रालय और अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय को इस मामले से अवगत कराया जाए।
4. पूर्व छात्रों की भूमिका: AMU Alumni Association दुनिया भर में एक कानूनी फंड बनाए और इस लड़ाई को लड़े।
5. छात्रों का शांतिपूर्ण आंदोलन: छात्रों से अपील है कि वो कानून हाथ में न लें। तख्तियां, मोमबत्ती मार्च और कानूनी लड़ाई – यही AMU की तहजीब है।

7. उपसंहार: ये लड़ाई आखिरी होनी चाहिए
106 साल में AMU ने दो विश्व युद्ध, देश का बंटवारा, आपातकाल सब देखा है। लेकिन आजाद भारत में एक नगर निगम के दावे से उसके वजूद पर सवाल – ये दर्दनाक है।

यूनिवर्सिटी को ये याद रखना होगा कि “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाला जमाना नहीं है। “जिसके कागज पक्के, वही सिकंदर” है।
और नगर निगम को ये याद रखना होगा कि आप एक शहर के रखवाले हैं, किसी तहजीब के दुश्मन नहीं।

वाइस चांसलर प्रोफेसर नईमा खातून ने महिला वाइस चांसलर होने के बावजूद रात के अंधेरे में पहुंच कर जिस अंदाज से नगर निगम की आँखों में आँखें डाल कर यूनिवर्सिटी की जमीन को बचाने की कोशिश की है आइए हम सब मिलकर ये प्रण लें कि AMU की एक इंच जमीन भी नहीं जाएगी। क्योंकि ये जमीन नहीं, 20 करोड़ भारतीय मुसलमानों और करोड़ों गैर-मुस्लिमों की उम्मीदों की जमीन है।

“कामिल हो अगर दिल में हौसला, तो हर दीवार झुक जाती है। तारीख गवाह है, AMU कभी रुकी नहीं है, और न रुकेगी।”

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