डॉ अब्दुल कुद्दूस हाशमी
लखनऊ। 12 रबीउल अव्वल मानव इतिहास की उस महान घटना की याद दिलाता है, जिसने दुनिया को एक नई रोशनी दी। यह दिन केवल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं कि मक्का मुकर्रमा की धरती पर हज़रत अब्दुल्लाह के घर एक बच्चे की पैदाइश हुई, बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसी बच्चे के रूप में वह महान हस्ती दुनिया में तशरीफ़ लाई, जिसने इंसान को इंसान बनना सिखाया, उसे उसके रब से जोड़ा, जीवन का उद्देश्य बताया और मानव समाज को ईमान, न्याय, समानता, दया तथा अच्छे अख़लाक़ की बुनियाद पर खड़ा किया।
रसूलुल्लाह ﷺ की बेसत किसी एक क़ौम, नस्ल या क्षेत्र के लिए नहीं थी। क़ुरआन-ए-करीम ने आपको “रहमतुल्लिल आलमीन” कहा। आप ﷺ ऐसे समाज में तशरीफ़ लाए जहाँ क़बायली बड़प्पन, अमीर-गरीब का भेद, ताक़तवर और कमज़ोर के बीच अंतर तथा मानव अधिकारों की पामाली ने सामाजिक जीवन को बिखेर दिया था। आपने केवल धार्मिक विश्वासों में सुधार नहीं किया, बल्कि इंसान और समाज की पूरी सोच को बदल दिया।
आज दुनिया में सामाजिक न्याय, समान अधिकार और मानव गरिमा की चर्चा होती है। लेकिन रसूलुल्लाह ﷺ ने लगभग चौदह सौ वर्ष पहले इन सिद्धांतों को केवल बताया ही नहीं, बल्कि अपने आचरण से लागू करके दिखाया। आपने स्पष्ट किया कि इंसान की क़ीमत उसके धन, परिवार, रंग, नस्ल या क़बीले से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और तक़वा से होती है। अरब और अजम, गोरे और काले, अमीर और गरीब, स्वतंत्र और गुलामकृसभी इंसान हैं और सभी सम्मान के अधिकारी हैं।

इसकी सबसे प्रभावशाली मिसाल हज़रत बिलाल हब्शीؓ हैं। एक गुलाम और हब्शी काले व्यक्ति को ऐसा सम्मान दिया गया कि काबा जैसी पवित्र इबादतगाह की छत पर खड़े होकर अज़ान देने का गौरव उन्हें मिला। यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं था, बल्कि उस समय के नस्ली और क़बायली अहंकार के सामने इस्लाम का स्पष्ट संदेश था कि इंसान की ऊँचाई उसके रंग और नस्ल से नहीं, उसके ईमान और किरदार से होती है।
सामाजिक न्याय का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कानून की नज़र में समानता है। एक प्रभावशाली परिवार की महिला चोरी के अपराध में पकड़ी गई। कुछ लोगों ने उसकी सज़ा रुकवाने के लिए सिफ़ारिश की। इस पर रसूलुल्लाह ﷺ ने स्पष्ट किया कि पिछली क़ौमें इसलिए तबाह हुईं कि वे ताक़तवर लोगों को छोड़ देती थीं और कमज़ोरों पर कानून लागू करती थीं। आपने अपने सबसे क़रीबी रिश्ते की मिसाल देते हुए फ़रमाया कि अगर फातिमा बिन्त-ए-मुहम्मदؓ भी चोरी करतीं तो उन पर भी वही कानून लागू होता।
यह केवल कानून का बयान नहीं था, बल्कि एक सार्वभौमिक सिद्धांत था कि न्याय रिश्ते, धन, पद और प्रभाव देखकर नहीं बदलता। आज जिसे हम सामाजिक न्याय और Rule of Law कहते हैं, उसकी एक उज्ज्वल उदाहरण सीरत-ए-रसूल ﷺ में दिखाई देता है।
जो सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं के अधिकार और उनकी गरिमा की रक्षा करना था। रसूलुल्लाह ﷺ की बेसत से पहले अरब के कुछ समाजों में बेटी का जन्म शर्म की बात समझा जाता था। नवजात बच्चियों को ज़िंदा दफ़न करने जैसी क्रूर प्रथाएँ मौजूद थीं। महिलाओं को पिता की जायदाद ,संपत्ति और विरासत से वंचित रखा जाता और कई परिस्थितियों में उन्हें स्वयं एक संपत्ति समझा जाता था। इस्लाम ने इस सोच को बदल दिया। क़ुरआन ने बेटियों के साथ होने वाले अत्याचार को समाप्त किया, सुरा निसा में महिलाओं के अधिकारों की विस्तार से चर्चा की उनके महत्व को स्वीकार किया और उन्हें विरासत में हिस्सा दिया। रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने कथन और आचरण से महिलाओं के सम्मान को समाज का हिस्सा बनाया।
यह केवल कानून का परिवर्तन नहीं था; यह इंसानी सोच का परिवर्तन था।
रसूलुल्लाह ﷺ की शिक्षाओं का दायरा केवल मानव संबंधों तक सीमित नहीं था। आपने पशु , पक्षी के साथ दया करने एवं स्वच्छता, पाकीज़गी, संयम और पर्यावरण की रक्षा पर भी ज़ोर दिया। पानी के बेवजह इस्तेमाल से रोका, पेड़ों और हरियाली की रक्षा की प्रेरणा दी और पाकीज़गी को आधा ईमान बताया। आज जब दुनिया प्रदूषण, पानी की कमी, पेड़ों की कटाई और पर्यावरण संकट से जूझ रही है, हज़रत मोहम्मद सल के कथन हमें याद दिलाते है कि धरती और उसके संसाधन हमारे पास एक अमानत हैं।
लेकिन यहाँ से सीरत का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने आता है-
हमने सीरत से क्या लिया?
हम सीरत पढ़ते हैं, सुनते हैं, महफ़िलें करते हैं, नातें पढ़ते हैं और मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ का इज़हार करते हैं। ये सभी प्रेम और अकीदत के सुंदर रूप हैं, लेकिन यदि सीरत पढ़ने के बाद भी हमारे अख़लाक़ में बदलाव नहीं आया, हमारे व्यवहार में ईमानदारी नहीं आई,
हमारी ज़ुबान झूठ, ग़ीबत और दिल-आज़ारी से सुरक्षित नहीं हुई,
हमारी इबादत ने हमें बेहतर इंसान नहीं बनाया और अल्लाह से हमारा संबंध मजबूत नहीं हुआ,
तो हमें अपने भीतर झाँकने की आवश्यकता है।
हमने सीरत को पढ़ा और सुना ज़रूर है, लेकिन क्या हम उसकी रूह तक पहुँचे हैं?
सीरत का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है जब सब्र हमारे लिए केवल एक शब्द नहीं रहता,
बल्कि जीवन जीने का तरीका बन जाता है; जब माफ़ी हमारे चरित्र का हिस्सा बन जाती है;
जब ईमानदारी हमारे रोज़मर्रा के व्यवहार की बुनियाद बनती है;
जब न्याय केवल भाषण का विषय नहीं रहता, बल्कि हमारे फैसलों में दिखाई देता है और जब इबादत हमारे भीतर अल्लाह के प्रति जवाबदेही और उसकी मख़लूक़ के लिए भलाई पैदा करती है।
रसूलुल्लाह ﷺ की ज़िंदगी हमें केवल भावनाएँ नहीं देती, बल्कि इत्तिबा और अमल की प्रेरणा देती है। सच्ची मुहब्बत का प्रमाण यही है कि हम अपने महबूब के अख़लाक़ और जीवन-मूल्यों को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाएँ।
इसीलिए मिलाद-ए-रसूल ﷺ की सार्थकता को भी इसी दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। मिलाद खुशी, प्रेम और अकीदत व्यक्त करने का अवसर है, लेकिन इसे अनावश्यक खर्च, शोर-शराबे और गैर-गंभीर गतिविधियों तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
यदि विलादत-ए-रसूल ﷺ की याद हमें अपने अख़लाक़, व्यवहार और किरदार को सुधारने की प्रेरणा देती है, तो यही इस अवसर की सबसे बड़ी सफलता है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने केवल व्यक्तियों का सुधार नहीं किया, बल्कि चरित्रवान इंसान तैयार किए और उन्हीं लोगों से एक आदर्श समाज का निर्माण किया। आपके प्रशिक्षित सहाबा-ए-करामؓ इसका उज्ज्वल उदाहरण हैं।
ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन के दौर में सत्ता को सुविधा नहीं बल्कि जिम्मेदारी समझा गया। हज़रत उमर फ़ारूक़ؓ की ज़िंदगी इसकी प्रेरणादायक मिसाल है। एक बार आपने एक महिला को देखा, जो अपने भूखे बच्चों को बहलाने के लिए चूल्हे पर खाली हांडी रखे हुए थी। उसकी स्थिति जानने के बाद आप बैतुलमाल गए, आटा और आवश्यक सामान लिया और स्वयं अपने कंधे पर उठाकर उसके घर पहुँचे। यह घटना बताती है कि रसूलुल्लाह ﷺ की तर्बियत ने नेतृत्व का अर्थ बदल दिया थाकृ
हुकूमत सेवा बन गई,
अधिकार जिम्मेदारी बना और जनता का दुख शासक का अपना दुख बन गया।
रसूलुल्लाह ﷺ की सीरत का एक सुंदर पहलू आपके अहल-ए-बैत से संबंध भी है। हज़रत फ़ातिमाؓ, हज़रत अलीؓ, हज़रत हसनؓ और हज़रत हुसैनؓ आपके घराने की वे महान हस्तियाँ हैं, जिनकी ज़िंदगियों में ईमान, इबादत, सादगी, सब्र, क़ुर्बानी, बहादुरी, इल्म और हक़-पसंदी के उज्ज्वल उदाहरण मिलते हैं।
हज़रत फ़ातिमाؓ की सादगी और सब्र, हज़रत अलीؓ का इल्म, न्याय और बहादुरी, हज़रत हसनؓ का त्याग और सुलह की भावना तथा हज़रत हुसैनؓ की सत्य और न्याय के लिए महान क़ुर्बानी हमें यह सिखाती है कि अहल-ए-बैत से मुहब्बत केवल भावनाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनकी ज़िंदगी के अच्छे गुणों को अपनाना ही इस मुहब्बत का वास्तविक तक़ाज़ा है।
आज भारत के वर्तमान सामाजिक वातावरण में सीरत-ए-रसूल ﷺ की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। हमारा देश विभिन्न धर्मों, भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं का देश है। ऐसे समाज में हमें नफ़रत के बजाय भरोसा, भेदभाव के बजाय न्याय, उत्तेजना के बजाय हिकमत और दुश्मनी के बजाय संवाद को बढ़ावा देना चाहिए।
यदि कोई झूठी खबर फैलाए तो बिना जाँच उसे आगे न बढ़ाएँ। यदि कोई भड़काए तो भड़कावे का हिस्सा न बनें। मतभेद को दुश्मनी में न बदलें और किसी जरूरतमंद की मदद उसकी इंसानियत के आधार पर करें। यही सीरत का व्यावहारिक संदेश है।
विशेष रूप से युवाओं और विद्यार्थियों के लिए सीरत का यह संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। आज उनके हाथ में किताब के साथ मोबाइल भी है और ज्ञान के साथ सूचनाओं की विशाल दुनिया भी। इसलिए उन्हें समझना होगा कि ज़ुबान, क़लम और तकनीककृतीनों जिम्मेदारी हैं।
सोशल मीडिया पर झूठ न फैलाना, किसी की प्रतिष्ठा को ठेस न पहुँचाना, परीक्षा में ईमानदारी रखना, समय की क़द्र करना, माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान करना, पड़ोसी के अधिकारों का ध्यान रखना, स्वच्छता बनाए रखना, पानी और प्राकृतिक संसाधनों को बर्बाद न करना तथा अपने ज्ञान का उपयोग इंसानियत की भलाई के लिए करनाकृये सभी सीरत के व्यावहारिक तक़ाज़े हैं।
हमें अपनी नई पीढ़ी से कहना होगा कि अपनी पहचान केवल नारों से नहीं बल्कि अपने किरदार से बनाएँ। ज्ञान प्राप्त करें, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ें, लेकिन नैतिकता को पीछे न छोड़ें। सफलता प्राप्त करें, लेकिन ईमानदारी के साथ। मतभेद रखें, लेकिन सम्मान के साथ। अपने धर्म से मुहब्बत करें, लेकिन इंसानियत के सम्मान और देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ।
अंततः सीरत हमें आत्ममंथन और आत्मसुधार का संदेश देती है। हमें दूसरों को देखने से पहले अपने भीतर झाँकना होगाकृ
क्या हमारी बात में सच्चाई है?
क्या हमारे किरदार में पवित्रता और पाकीज़गी है?
क्या हमारे व्यवहार में ईमानदारी है?
क्या हमारी इबादत हमें बेहतर इंसान बना रही है?
क्या हमारे दिल में अल्लाह की मुहब्बत और उसकी मख़लूक़ और प्राणियों के लिए भलाई की भावना है?
क्या हमारे परिवार वाले, पड़ोसी और साथी हमारे व्यवहार से सुरक्षित और महफ़ूज़ हैं?
और सबसे बढ़करकृक्या हमारा जीवन वास्तव में रसूलुल्लाह ﷺ के उसव-ए-हसनह की तस्वीर पेश कर रहा है?
यदि इन सवालों के जवाब हमें अपनी कमियों का एहसास कराने लगें तो समझना चाहिए कि सीरत का असर हमारे दिल तक पहुँच रहा है।
मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ केवल भावनाओं का नाम नहीं, बल्कि इंसान को बदल देने वाली शक्ति है। हमें अपनी नई पीढ़ी को केवल यह बताने की जरूरत नहीं कि रसूलुल्लाह ﷺ महान थे; हमें यह भी समझाना होगा कि आप ﷺ की महानता का वास्तविक सम्मान यही है कि हमारी ज़िंदगी आपके अख़लाक़, न्याय, रहम, समानता , उत्तम आदर्श और उसव-ए-हसनह की झलक पेश करे।
आइए, इस अवसर पर संकल्प लें कि सीरत को केवल किताबों में नहीं रखेंगे, बल्कि उसे अपनी ज़िंदगी में उतारेंगे; उसे केवल भाषणों में बयान नहीं करेंगे, बल्कि अपने किरदार से पेश करेंगे; मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने कर्तव , व्यवहार, इबादत, नैतिकता, अल्लाह से संबंध, सामाजिक ज़िम्मेदारी और इंसानियत की सेवा में प्रकट करेंगे।
तभी मिलाद हमारे लिए केवल एक तारीख या औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहेगा, बल्कि सीरत-ए-रसूल ﷺ को जीवन में उतारने, अपने किरदार की इस्लाह करने और इंसानियत की सेवा का संकल्प बन जाएगा।
यही मुहब्बत-ए-रसूल ﷺ का वास्तविक तक़ाज़ा है, यही उसव-ए-हसनह का संदेश है और यही वह रास्ता है जो हमारी दुनिया को भी बेहतर बना सकता है और हमारी आख़िरत को भी कामयाब।
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