बाराबंकी । माननीय सिविल जज (जू०डि०) कोर्ट नं०-13, बाराबंकी के समक्ष विचाराधीन दीवानी वाद संख्या 1228/2024 (सम्बद्ध सिविल सूट 821/2024) में मजार हज़रत मखदूम शाह कमेटी की एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत हुई है। न्यायालय ने सत्य और साक्ष्यों को स्वीकार करते हुए दिनांक 31 अक्टूबर 2026 को वादी पक्ष के झूठे मुकदमे को पूरी तरह से अस्वीकार (खारिज) कर दिया है। यह महत्वपूर्ण जानकारी मजार परिसर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कमेटी के मुख्य अधिवक्ता मेराज अंसारी एडवोकेट ने मीडियाकर्मियों को दी।

मामले की मुख्य पृष्ठभूमि और विवाद-
यह पूरा मामला ग्राम सूरसंडा, परगना व तहसील नवाबगंज, जिला बाराबंकी में स्थित प्रसिद्ध मजार हज़रत मखदूम शाह से जुड़ा हुआ है। यह पवित्र मजार उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की पंजीकृत संपत्ति है, जिसका वक्फ नंबर 127 है। पिछले कई दशकों से इस मजार की कोई भी आधिकारिक कमेटी का रिन्यूअल (नवीनीकरण) न होने के कारण आसपास के कुछ स्थानीय लोगों द्वारा सामान्य रूप से इसकी देखरेख की जा रही थी। वक्फ की इस महत्वपूर्ण संपत्ति की जिम्मेदारी और सुचारू प्रबंधन को देखते हुए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने दिनांक 28 मई 2024 को अपने पत्र संख्या 1082/द-127 के माध्यम से एक नई आधिकारिक कमेटी का गठन किया, जिसमें अली वारिस (पुत्र अब्दुल अजीज) को विधिवत मुतवल्ली मनोनीत किया गया।
साजिश और कानूनी लड़ाई-
वक्फ बोर्ड द्वारा नई कमेटी गठित किए जाने से क्षुब्ध होकर पूर्व में काबिज कुछ लोगों (वादी पक्ष) ने सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मजार की बेशकीमती संपत्ति (गाटा संख्या 1251) पर अपना मालिकाना हक जताते हुए झूठा मुकदमा (दावा घोषणात्मक) दायर कर दिया। कानूनी जांच और दस्तावेजों की गहन तहकीकात के दौरान यह सच सामने आया कि वादी पक्ष के पूर्वजों ने बहुत ही चालाकी से सरकारी कागजातों में हेर-फेर करके अपने नाम भी दर्ज करा लिए थे।
सत्य की जीत और वक्फ संपत्ति का संरक्षण-
ष्झूठ चाहे कितना भी गहरा हो, सच के सामने कभी नहीं टिक सकता।ष् मजार हज़रत मखदूम शाह कमेटी ने बेहद कड़ी मेहनत और लगन से मजार के पुराने व प्रामाणिक सरकारी दस्तावेज निकालकर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। इन अकाट्य साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने वादी पक्ष के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
अधिवक्ताओं की टीम और सहयोगियों का विशेष धन्यवाद-
मजार शाह की ओर से इस पूरे मुकदमे की प्रभावी पैरवी बाराबंकी के प्रसिद्ध होम्योपैथिक चिकित्सक और वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. ए. ए. अंसारी के सुपुत्र और माननीय उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) लखनऊ के अधिवक्ता मेराज अंसारी एवं उनके सहयोगी अभिषेक दास एडवोकेट व उनकी पूरी टीम द्वारा की गई। अधिवक्ताओं की इस टीम ने बेहतरीन कानूनी रणनीति और अथक प्रयासों से वक्फ की इस पवित्र और ऐतिहासिक संपत्ति को गलत हाथों में जाने और इसका दुरुपयोग होने से पूरी तरह बचा लिया है।
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